रूबरू
06 05 2008 by वाचून बघावो बैठे हैं रूबरू और शाम ढलने को है
दरमियाँ का शीशा अब पिघलने को है
छोड़ आया बीच मझधार यादों को तेरी
डूबती यह नैया अब सम्हलने को है
क्या है ये शोरो-गुल, क्यों धुआँ सा है
शायद फिर कारवां निकलने को है
तेरे संग तराशे थे जो नाजों से हमने
वक़्त का दरिया वो लम्हे निगलने को है
मैंने जल्दबाजी में काटी है जिंदगी,पर
इतमिनान से बड़े दम निकलने को है
रोज नया ऐलाने-जंग सुनता हूँ मैं
देखें कौन इंसानियत कुचलने को है
मुद्दतों बाद हल्की मुस्कुराहट ये कैसी
जानता हूँ अब ये लावा उगलने को है