सुबह
नहीं जानता मैं कि उस ओर क्या है
यहाँसे जुदा वहाँ और क्या है
जहाँ रोशनी है, वहाँ कुछ तो होगा,
अनबनीमें शायद नया सचभी होगा…
सवालोंमें उलझासा दिलका जहाँ है
परखूँ जवाबोंको फुरसत कहाँ है
नहाता उजालेमें कोई कल तो होगा
भरा उम्मीदोंसे कोई पल तो होगा ?
मैं हूँ मानता कि यह रस्ता नया है
सिवा हमारे न कोई गया है
पुकारे है मंझिल और जानाही होगा
होनी है सुबह दिनको आनाही होगा !
03 05 2008 at 6:00 am
मंझिल - मंज़िल
सुबह छः बजे यह प्रेरणादायक कविता पढ़ाने के लिए शुक्रिया।
03 05 2008 at 9:10 am
wo subhah jarur hogi bas man ki kiwado ko kholne ki der bhar hai,bahut khubsurat kavita hai.
08 05 2008 at 1:03 am
Thanks, glad you liked it !