रूबरू

By वाचून बघा

वो बैठे हैं रूबरू और शाम ढलने को है
दरमियाँ का शीशा अब पिघलने को है
छोड़ आया बीच मझधार यादों को तेरी
डूबती यह नैया अब सम्हलने को है
क्या है ये शोरो-गुल, क्यों धुआँ सा है
शायद फिर कारवां निकलने को है
तेरे संग तराशे थे जो नाजों से हमने
वक़्त का दरिया वो लम्हे निगलने को है
मैंने जल्दबाजी में काटी है जिंदगी,पर
इतमिनान से बड़े दम निकलने को है
रोज नया ऐलाने-जंग सुनता हूँ मैं
देखें कौन इंसानियत कुचलने को है
मुद्दतों बाद हल्की मुस्कुराहट ये कैसी
जानता हूँ अब ये लावा उगलने को है

5 प्रतिसाद to “रूबरू”

  1. MEET Says:

    अच्छा है.

  2. Marathi movies Says:

    Kharach khup chan kavita ahe hi..

  3. Asha Joglekar Says:

    बहुत खूब !

  4. वाचून बघा Says:

    शुक्रिया , आदाब !

  5. Constantine Says:

    mast

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